Tuesday, September 24, 2024

नकद लेनदेन और उधारी का कम होना: भारत की नकदी अर्थव्यवस्था पर एक नज़र

 

 नकद लेनदेन और उधारी का कम होना:
 भारत की नकदी अर्थव्यवस्था पर एक नज़र


आज के डिजिटल युग में, उस समय की कल्पना करना मुश्किल है जब नकद का राज था और उधारी कम थी। फिर भी, ज्यादा समय पहले की बात नहीं है, खासकर छोटे कस्बों और गांवों में, जब अधिकतर लेन-देन नकद में होते थे। उधारी यानी क्रेडिट की प्रथा तो थी, लेकिन इसका प्रयोग सीमित था और यह केवल कुछ खास रिश्तों पर ही निर्भर थी। इस ब्लॉग में हम उस दौर पर चर्चा करेंगे जब नकद लेन-देन का प्राथमिक माध्यम था और उधारी बहुत कम मामलों में की जाती थी। हम जानेंगे कि क्यों नकद व्यापार पर हावी था, उधारी क्यों सीमित थी, और समय के साथ इसमें कैसे बदलाव आया ?

नकद: पसंदीदा माध्यम

डिजिटल क्रांति से पहले, खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में, भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से नकद पर आधारित थी। नकद सरल, तुरंत और सार्वभौमिक रूप से स्वीकार्य था। चाहे आप किराने का सामान खरीद रहे हों, कपड़े ले रहे हों, या बढ़ई या प्लंबर जैसी  सेवाओं के लिए भुगतान कर रहे हों, नकद ही प्राथमिक साधन था।

नकद के प्राथमिकता पाने का मुख्य कारण उसकी सरलता थी। लेन-देन बिना किसी बैंक, दस्तावेज़ या औपचारिक समझौतों के किया जा सकता था। यह तत्काल मूल्य का आदान-प्रदान था और लोगों के बीच विश्वास की एक सीधी संस्कृति को बढ़ावा देता था। नकद लेन-देन के माध्यम से लोग अपने हर रुपये का महत्व जानते थे और इससे तत्काल निर्णय लेने और कीमतों पर बातचीत करने की सुविधा मिलती थी।

 उधारी की भूमिका

हालांकि नकद व्यापार पर हावी था, उधारी का भी अस्तित्व था लेकिन यह सीमित थी। यह हर किसी के लिए उपलब्ध नहीं थी, और न ही यह सभी प्रकार के लेन-देन में होती थी। दुकानदार, उदाहरण के लिए, उधारी केवल उन्हीं ग्राहकों को देते थे जिनके साथ उनका पुराना और भरोसेमंद संबंध था। ये आमतौर पर वे लोग होते थे जिनके बारे में यह निश्चित होता था कि वे समय पर भुगतान करेंगे और देरी नहीं करेंगे।

उस दौर में, उधारी लेना हल्के में नहीं लिया जाता था। यह एक सामाजिक जिम्मेदारी थी, क्योंकि समय पर भुगतान न करने से न केवल आपकी प्रतिष्ठा खराब होती थी, बल्कि दुकानदार या सेवा प्रदाता के साथ भविष्य के संबंध भी प्रभावित होते थे। आज की तरह नहीं, जब क्रेडिट बैंकों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से आसानी से उपलब्ध है, उधारी की प्रणाली पूरी तरह से व्यक्तिगत भरोसे और ईमानदारी पर आधारित थी। समय पर भुगतान न करना सिर्फ आर्थिक असफलता नहीं, बल्कि नैतिक असफलता भी मानी जाती थी।

 उधारी की सीमितता

उधारी व्यापक रूप से क्यों नहीं फैल पाई, इसके कुछ प्रमुख कारण थे:-

1. **औपचारिक क्रेडिट प्रणाली की कमी**: छोटे कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में औपचारिक क्रेडिट सिस्टम की कमी थी, इसलिए उधारी एक अनौपचारिक व्यवस्था थी, जो केवल भरोसे पर आधारित थी।

2. **नकद तरलता**: अधिकांश लोग नकद में लेन-देन करना पसंद करते थे क्योंकि यह तत्काल तरलता प्रदान करता था और कर्ज को ट्रैक करने की जटिलताओं से बचाता था। नकद लेन-देन करने वाला व्यक्ति उधारी के तनाव से मुक्त होकर अधिक स्वतंत्र रूप से जी सकता था।

3. **आर्थिक सीमाएँ**: भारत के कई हिस्सों, विशेषकर कृषि समुदायों में, लोग अपने सीमित संसाधनों पर निर्भर रहते थे। वे क्रेडिट या उधारी लेने का जोखिम तभी उठाते थे जब यह अत्यावश्यक होता।

4. **रूढ़िवादी मानसिकता**: उधार लेने को लेकर सांस्कृतिक झिझक भी थी। लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही जीने में विश्वास रखते थे और उधार लेना अंतिम विकल्प माना जाता था।

नकद और उधारी का सांस्कृतिक और सामाजिक पहलू

नकद लेन-देन की संस्कृति भारतीय समाज की गहरी जड़ें थी। नकद आर्थिक स्वतंत्रता और सुरक्षा का प्रतीक था। अधिकांश घरों में, नकदी की उपलब्धता यह निर्धारित करती थी कि वे क्या खरीद सकते हैं और उनके खर्चों का बजट कड़ा होता था। इस नकदी संस्कृति ने खर्चों पर अनुशासन और सीमित संसाधनों में जीवनयापन को बढ़ावा दिया।

वहीं, उधारी को एक विशेषाधिकार माना जाता था जो कुछ चुनिंदा लोगों को ही मिलता था। जो दुकानदार या सेवा प्रदाता उधारी देते थे, वे ऐसा बड़े सावधानीपूर्वक करते थे और ग्राहक की विश्वसनीयता पर ध्यान रखते थे। एक बार चूक होने पर व्यापारिक संबंधों को हानि हो सकती थी और सामाजिक प्रतिष्ठा भी प्रभावित हो सकती थी।

आधुनिक युग में परिवर्तन

बैंकिंग, क्रेडिट कार्ड और हाल ही में डिजिटल भुगतान प्रणाली के आगमन के साथ, नकद और उधारी की गतिशीलता में बड़े बदलाव आए हैं। आज भी भारत के कई हिस्सों में नकद लेन-देन का बोलबाला है, खासकर ग्रामीण इलाकों में, लेकिन उधारी अब औपचारिक क्रेडिट प्रणाली का रूप ले चुकी है, जैसे कि व्यक्तिगत ऋण, माइक्रोफाइनेंस, और "अब खरीदें, बाद में भुगतान करें" (BNPL) योजनाएं।

पहले, अगर आपके पास नकद नहीं था, तो या तो आप बिना काम के रहते थे या भरोसेमंद स्रोत से उधारी लेते थे। आज, क्रेडिट कार्ड, मोबाइल वॉलेट और लोन ऐप्स के साथ, यहां तक कि सीमित वित्तीय साक्षरता वाले लोग भी आसानी से क्रेडिट तक पहुंच सकते हैं। इसने छोटे स्तर के लेन-देन में उधारी की भूमिका को बहुत कम कर दिया है।

 उधारी का कम होना

उधारी की कमी के पीछे कुछ प्रमुख कारण हैं:

1. **डिजिटल भुगतान का उदय**: UPI (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) और मोबाइल वॉलेट जैसी डिजिटल भुगतान विधियों के उदय ने त्वरित लेन-देन की सुविधा दी है, जिससे कई मामलों में क्रेडिट की आवश्यकता समाप्त हो गई है।

2. **औपचारिक क्रेडिट की उपलब्धता**: बैंकिंग प्रणाली और फिनटेक कंपनियों द्वारा व्यक्तिगत ऋण देने से उधारी की जगह अधिक संरचित ऋण प्रणालियों ने ले ली है।

3. **मानसिकता में बदलाव**: आज लोग व्यक्तिगत संबंधों पर निर्भर रहने की बजाय औपचारिक क्रेडिट लेने के लिए अधिक खुले हैं। औपचारिक संस्थानों से उधार लेने पर अब वह सामाजिक झिझक नहीं है, जो पहले उधारी मांगने में होती थी।

4.    बढ़ता उपभोक्तावाद**: लोगों की आवश्यकताएं और इच्छाएं समय के साथ बढ़ी हैं, और उधारी पर बार-बार या महंगे लेन-देन करना अब व्यावहारिक नहीं है। आधुनिक उपभोक्ता त्वरित संतुष्टि की इच्छा रखता है, और डिजिटल क्रेडिट विकल्प इसे संभव बनाते हैं।

#### निष्कर्ष
वह समय जब नकद बाजार का राजा था और उधारी दुर्लभ थी, धीरे-धीरे स्मृति में धुंधला हो रहा है। पिछले कुछ दशकों में भारत का आर्थिक परिदृश्य तेजी से बदल गया है, जहां डिजिटल भुगतान और औपचारिक क्रेडिट ने प्रमुख स्थान ले लिया है। हालांकि, उस दौर से सीखे गए सबक—खासकर विश्वास, वित्तीय जिम्मेदारी, और अपनी सामर्थ्य में रहने की अहमियत—समय के साथ भी प्रासंगिक बने हुए हैं।

हम जब पीछे मुड़कर देखते हैं, तो नकद लेन-देन की ताकत और उधारी के माध्यम से विश्वास और सम्मान को समझ सकते हैं। हालांकि ये प्रणालियां विकसित हो गई हैं, लेकिन इनकी मूल भावना आज भी हमारे पैसे और क्रेडिट के प्रति दृष्टिकोण को प्रभावित करती है।


"CASH" IS KING ALWAYS 
BUT 
NOW A DAYS 
"CREDIT" IS ALSO KING.

ARTICLE  COMPILED BY - DIVYESH KOTHARI

Sunday, September 15, 2024

2024 में भारत में आईपीओ (IPO) के बारे में एक व्यापक दृष्टिकोण

 


2024 में भारत में आईपीओ (IPO) 

के बारे में  

एक व्यापक दृष्टिकोण




आईपीओ (Initial Public Offering) का महत्व और उससे जुड़ी संभावनाएं 2024 में भारत के निवेशकों के बीच चर्चा का प्रमुख विषय है। इस लेख में हम आसान और सरल भाषा में आईपीओ की प्रक्रिया, 2024 में इसके ट्रेंड्स, तथा निवेशकों के लिए संभावित लाभ और जोखिमों पर प्रकाश डालेंगे।


### आईपीओ क्या है? (IPO Kya Hai?)


IPO का मतलब होता है Initial Public Offering, जिसमें कोई निजी कंपनी पहली बार सार्वजनिक तौर पर अपने शेयर बेचती है। इसके जरिए कंपनी पूंजी जुटाती है और शेयर बाजार में सूचीबद्ध हो जाती है। इसके बाद कंपनी के शेयरों की खरीद-फरोख्त स्टॉक एक्सचेंज पर होती है। कंपनी को अपने व्यवसाय के विस्तार, कर्ज चुकाने या अन्य परियोजनाओं के लिए धन जुटाने के लिए आईपीओ का सहारा लिया जाता है।


### आईपीओ का निवेशकों के लिए महत्व


1. **प्रारंभिक निवेश के अवसर**: आईपीओ निवेशकों को शुरुआती स्तर पर किसी उभरती कंपनी में निवेश करने का मौका देता है। यदि कंपनी तेजी से बढ़ती है, तो निवेशकों को अधिक रिटर्न मिल सकता है।

   

2. **लिस्टिंग लाभ**: आईपीओ के बाद, कई बार कंपनी के शेयर की कीमत बढ़ जाती है। इस बढ़त को 'लिस्टिंग गेन' कहा जाता है, जिससे निवेशकों को शुरुआती रिटर्न मिलता है।


3. **डायवर्सिफिकेशन का अवसर**: आईपीओ निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो में विविधता लाने का अवसर प्रदान करता है। नए सेक्टर्स या इंडस्ट्रीज में निवेश करके वे रिस्क को संतुलित कर सकते हैं।


### 2024 में आईपीओ का परिदृश्य


2024 भारतीय शेयर बाजार के लिए आईपीओ के मामले में महत्वपूर्ण वर्ष साबित हो रहा है। बाजार में कई नए और उभरते क्षेत्रों में कंपनियां अपने आईपीओ ला रही हैं। आइए देखें कि इस साल आईपीओ के ट्रेंड्स क्या कह रहे हैं:


1. **तकनीकी और स्टार्टअप कंपनियों का प्रभुत्व**: भारत में स्टार्टअप्स का माहौल तेजी से बदल रहा है। खासकर डिजिटल, ई-कॉमर्स, एआई और फिनटेक कंपनियों ने आईपीओ के जरिए पूंजी जुटाने की योजना बनाई है। इन कंपनियों के आईपीओ को खास तौर पर युवा निवेशकों और हाई-रिस्क टॉलरेंट इन्वेस्टर्स से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है।


2. **मिड-कैप और स्मॉल-कैप कंपनियों की सक्रियता**: 2024 में मिड-कैप और स्मॉल-कैप कंपनियों के आईपीओ की भी अच्छी संख्या देखने को मिली है। इन कंपनियों में निवेश करने वाले निवेशक लंबी अवधि में अच्छे रिटर्न की उम्मीद कर सकते हैं, खासकर अगर ये कंपनियां अच्छे फंडामेंटल्स पर आधारित हैं।


3. **ग्रीन और क्लीन एनर्जी सेक्टर का आईपीओ बूम**: भारत में पर्यावरण अनुकूल परियोजनाओं पर जोर दिया जा रहा है। ग्रीन एनर्जी और क्लीन टेक्नोलॉजी कंपनियों के आईपीओ में निवेशकों की रुचि तेजी से बढ़ रही है। सरकार की नीतियों का भी समर्थन इन क्षेत्रों में आ रहा है, जिससे इन कंपनियों की संभावनाएं और बेहतर हो रही हैं।


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### 2024 में आईपीओ से जुड़े अवसर और चुनौतियां


#### अवसर (Opportunities)


1. **उच्च ग्रोथ संभावनाएं**: कई कंपनियां उच्च विकास वाले क्षेत्रों में काम कर रही हैं, जिससे उनके आईपीओ में निवेशकों को बेहतर लाभ की उम्मीद होती है। जैसे कि एआई, ऑटोमेशन, ग्रीन एनर्जी आदि।

   

2. **लिस्टिंग गेन**: बाजार में कई आईपीओ ने अपनी लिस्टिंग के दिन अच्छा रिटर्न दिया है। अगर बाजार की स्थिति अनुकूल रहती है, तो निवेशकों को शॉर्ट-टर्म में भी लाभ मिल सकता है।


3. **नए सेक्टर्स में निवेश**: 2024 में आईपीओ के जरिए नए-नए सेक्टर्स को एक्सप्लोर करने का मौका मिल रहा है। इसमें फिनटेक, एग्रीटेक, हेल्थटेक और क्लाउड कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्र प्रमुख हैं।


#### चुनौतियां (Challenges)


1. **अस्थिर बाजार**: 2024 में वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और महंगाई के कारण भारतीय शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव का दौर देखा जा सकता है। इस स्थिति में आईपीओ के प्रति निवेशकों का दृष्टिकोण भी बदल सकता है।


2. **ओवर-प्राइस्ड आईपीओ**: कई बार कंपनियां अपने आईपीओ का मूल्य ज्यादा तय कर देती हैं, जिससे निवेशकों को लॉन्ग-टर्म में नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए सही मूल्यांकन करना जरूरी है।


3. **रिस्क फैक्टर**: नए और उभरते सेक्टर्स की कंपनियां तेजी से ग्रोथ करती हैं, लेकिन इनमें रिस्क भी ज्यादा होता है। कुछ कंपनियां शुरुआती दौर में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पातीं, जिससे निवेशकों को नुकसान हो सकता है।


### 2024 में निवेशकों के लिए सुझाव


1. **कंपनी का फंडामेंटल विश्लेषण करें**: किसी भी आईपीओ में निवेश करने से पहले कंपनी की बैलेंस शीट, आय विवरण और अन्य वित्तीय डिटेल्स की गहन जांच करें। अच्छी फंडामेंटल वाली कंपनियां लंबे समय में बेहतर रिटर्न देती हैं।


2. **प्राइसिंग पर ध्यान दें**: आईपीओ के प्राइसिंग को ध्यान से देखें। ओवर-प्राइस्ड आईपीओ से दूर रहें, क्योंकि यह लॉन्ग-टर्म में नुकसान का कारण बन सकता है।


3. **लंबी अवधि के लिए निवेश करें**: आईपीओ निवेश को लंबे समय के लिए प्लान करें। शॉर्ट-टर्म लाभ के बजाय, लॉन्ग-टर्म ग्रोथ की संभावनाओं को प्राथमिकता दें।


4. **विशेषज्ञों की राय लें**: निवेश से पहले विशेषज्ञों की राय लें और रिसर्च रिपोर्ट्स पढ़ें। इससे आपको आईपीओ में निवेश से जुड़े लाभ और जोखिमों की जानकारी मिलेगी।


5. **जोखिम सहनशीलता का आकलन करें**: हर निवेशक की जोखिम सहनशीलता अलग होती है। अपने जोखिम सहने की क्षमता के आधार पर ही आईपीओ में निवेश करें।


### 2024 में प्रमुख आईपीओ


2024 में कई बड़े आईपीओ आने वाले हैं, जिनमें निवेशकों की रुचि ज्यादा हो सकती है। इनमें शामिल हैं:

- **XYZ टेक्नोलॉजीज**: यह कंपनी एआई और मशीन लर्निंग में काम करती है और इसका आईपीओ बाजार में काफी चर्चित है।

- **ABC फिनटेक**: फिनटेक क्षेत्र में काम करने वाली यह कंपनी अपने उपयोगकर्ताओं को डिजिटल बैंकिंग सेवाएं प्रदान करती है।

- **Green Energy Solutions**: क्लीन और ग्रीन एनर्जी के क्षेत्र में काम करने वाली यह कंपनी भारत में तेजी से बढ़ रही है और इसका आईपीओ निवेशकों के बीच आकर्षण का केंद्र है।


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### निष्कर्ष


2024 में भारत में आईपीओ निवेशकों के लिए एक बेहतरीन अवसर हो सकता है, बशर्ते वे सही कंपनी का चयन करें और जोखिमों को समझकर निवेश करें। नए क्षेत्रों में हो रही वृद्धि और बाजार की नई संभावनाएं इसे और भी रोमांचक बनाती हैं। हालांकि, निवेश करते समय सतर्कता बरतना और दीर्घकालिक दृष्टिकोण रखना जरूरी है।


डिस्क्लेमर

यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। इस लेख के लेखक वित्तीय विशेषज्ञ नहीं हैं। किसी भी प्रकार का निवेश करने से पहले कंपनी के फंडामेंटल्स और अन्य महत्वपूर्ण जानकारियों को मार्केट एक्सपर्ट्स से जांच कर लें। अपने निवेश से संबंधित निर्णय अपनी सोच, जोखिम सहनशीलता और आवश्यकताओं के आधार पर ही लें।

Sunday, August 13, 2023

pros and cons of investing in the share market

 


Pros and Cons of investing in the share market







Here are the pros and cons of investing in the share market:

Pros:

  1. Potential for High Returns: The stock market has historically provided higher returns compared to many other investment options over the long term. Well-performing stocks can yield substantial profits.

  2. Ownership in Companies: When you invest in stocks, you become a partial owner of the company. This gives you the potential to benefit from the company's growth and success.

  3. Liquidity: Stocks are generally highly liquid assets, allowing you to buy and sell them relatively quickly. This liquidity provides flexibility and the ability to access your funds when needed.

  4. Diversification: The stock market offers a wide variety of companies from different sectors and industries. This allows you to diversify your portfolio, reducing the impact of poor performance from any single stock.

  5. Dividend Income: Some stocks pay dividends to shareholders, providing a regular income stream in addition to potential capital appreciation.

  6. Ease of Access: With the advent of online trading platforms, investing in stocks has become more accessible and convenient for individual investors.

Cons:

  1. Volatility: The stock market is known for its volatility. Prices can fluctuate significantly over short periods, potentially leading to losses if you sell during a downturn.

  2. Risk of Loss: Investing in stocks carries the risk of losing your entire investment if the company performs poorly or goes bankrupt.

  3. Market Timing: Timing the market can be challenging, and attempting to buy or sell stocks based on short-term market movements can lead to poor investment decisions.

  4. Lack of Control: As a minority shareholder, you have limited control over the company's decisions and management, which might not align with your interests.

  5. Emotional Investing: Market fluctuations can evoke emotional responses, leading to impulsive decisions that may not align with your long-term financial goals.

  6. Research and Analysis: Successful stock investing requires thorough research and analysis. Lack of knowledge or research can lead to poor investment choices.

  7. External Factors: Economic, political, and global events can impact stock prices, sometimes leading to unpredictable market behavior.

  8. High Competition: The stock market is highly competitive, with professional investors and institutions vying for opportunities. This can make it challenging for individual investors to find undervalued stocks.

  9. Short-Term Focus: The stock market can encourage a short-term perspective, which might not be conducive to achieving long-term financial objectives.

  10. Fees and Costs: Trading fees, brokerage commissions, and other costs associated with investing in stocks can eat into your returns.


Before investing in the stock market, it's important to understand these pros and cons and carefully assess self risk tolerance, financial goals, and investment horizon. Many investors find success in the stock market by adopting a diversified, long-term approach and by staying informed about market trends and company fundamentals. If unsure, seeking guidance from financial professionals can be beneficial.

Sunday, July 30, 2023

स्टॉक मार्केट या शेयर बाजार

 स्टॉक मार्केट या शेयर बाजार 




शेयर मार्केट का इतिहास


16वीं सदी में डच ईस्ट इंडिया कंपनी का विदेशी व्यापार में दबदबा था. कंपनी दुनियाभर में जहाजों के जरिए व्यापार कर रही थी. लेकिन जहाजों का संचालन एक महंगा सौदा था. इसलिए कंपनी ने हर बंदरगाह के आसपास रहने वाले व्यापारियों की मदद लेना तय किया.


कंपनी ने व्यापारियों से संपर्क कर कहा कि अगर वे जहाजों के संचालन में पैसा लगाते हैं तो जहाजों से होने वाले मुनाफे में भी उन्हें हिस्सा मिलेगा. हिस्से को अंग्रेजी में शेयर कहा जाता है. व्यापारियों को ये योजना पसंद आई और उन्होंने जहाजों के संचालन में पैसा निवेश किया. इस व्यापार और हिस्सेदारी को दुनिया का पहला शेयर मार्केट कहा जाता है.


शेयर मार्केट की वर्तमान स्थिति


शेयर मार्केट की खबरों में सेंसेक्स और निफ्टी का जिक्र भी बार बार आता है. ये दोनों इंडेक्स यानी सूचकांक हैं. सेंसेक्स दो शब्दों सेंसटिव और इंडेक्स से बनकर मिला है. हिंदी में इसे संवेदी सूचकांक कहते हैं. बीएसई में मुख्य तौर पर 30 बड़ी कंपनियां लिस्टेड हैं. इन 30 कंपनियों की सेहत से ही सेंसेक्स तय होता है. सेंसेक्स इन कंपनियों की वित्तीय सेहत का पैमाना है.


मार्केट कैप


मार्केट कैप मतलब शेयर बाजार में आने के बाद कंपनी की कुल पूंजी. मानकर चलिए किसी कंपनी के पास 10 लाख रुपये की पूंजी है. लेकिन उसे और पूंजी की जरूरत है. ऐसे में उसने पचास प्रतिशत हिस्से के शेयर जारी कर दिए. मानकर चलिए 1 लाख शेयर जारी किए गए जिनकी कीमत प्रति शेयर 10 रुपये थी. इसको आईपीओ निकालना कहा जाएगा. कंपनी को उम्मीद थी की इससे उन्हें 10 लाख रुपये मिलेंगे. लेकिन निवेशकों को कंपनी का आइडिया अच्छा लगा और उसके शेयरों की डिमांड बढ़ गई. कंपनी के शेयर 10 की जगह 50 रुपये प्रति शेयर के हिसाब से बिके. ऐसे में कंपनी को 50 लाख रुपये की कमाई हुई. पूंजी की ये पूरी कमाई मार्केट कैपिटलाइजेशन या मार्केट कैप कहलाती है.


फ्री फ्लोट फैक्टर


अब जब कंपनी की 50 प्रतिशत हिस्सेदारी पब्लिक में बिक गई है तो इस 50 प्रतिशत हिस्से से ही कंपनी का सूचकांक तय होगा. ये 50 प्रतिशत हिस्सा शेयर मार्केट के हिसाब से चलेगा. शेयर बाजार में बढ़ोत्तरी पर कंपनी का मार्केट कैप बढ़ेगा और घटने पर घटेगा. यह हिस्सा कंपनी के कामकाज से मुक्त यानी फ्री रहेगा. इसलिए इसे फ्री फ्लोट फैक्टर कहते हैं. इसकी कैल्कुलेशन का भी एक फॉर्मूला है.


जब कोई कंपनी अच्छा प्रदर्शन करती है, तो उसके शेयरों को लोग ज्यादा खरीदते हैं और उसकी डिमांड बढ़ जाती है. ऐसे ही जब किसी कंपनी के बारे में ये अनुमान लगाया जाए कि भविष्य में उसका मुनाफा कम होगा, तो कंपनी के शेयर गिर जाते हैं. 


भारत जैसे कृषि प्रधान देश में बारिश अच्छी या खराब होने का असर भी शेयर मार्केट पर पड़ता है. खराब बारिश से बाजार में पैसा कम आएगा और मांग घटेगी. ऐसे में शेयर बाजार भी गिरता है. हर राजनीतिक घटना का असर भी शेयर बाजार पर पड़ता है. चीन और अमेरिका के कारोबारी युद्ध से लेकर ईरान-अमेरिका तनाव का असर भी शेयर बाजार पर पड़ता है. इन सब चीजों से व्यापार प्रभावित होते हैं.


व्यापार से संबंधित कारकों के अलावा, शेयरों की कीमतें अर्थव्यवस्थाओं, मुद्रास्फीति, ब्याज दरों, विदेशी बाजारों, वैश्विक वित्त और अधिक को बदलने से भी प्रभावित होती हैं। निवेशकों को बाजार के रुझान के शीर्ष पर रहने के लिए सक्षम होने के लिए बदलते घटनाक्रम के लिए बाहर देखना चाहिए। यह जानकारी उन्हें निर्णय लेने के लिए प्रेरित करती है जो नुकसान से बचने में मदद करेगी। जब बहुत सारे स्टॉक इतने हद तक प्रभावित होते हैं कि यह बाजार में लहर पैदा कर सकता है, तो यह स्टॉक मार्केट क्रैश का कारण बन सकता है।




स्टॉक मार्केट या शेयर बाजार बिना मेहनत के पैसा कमाने की जगह लोगों को लगती है, लेकिन ऐसा नहीं है । यह  पैसिव इनकम कमाने का एक जरिया है परन्तु आजकल कोरोना वायरस के बाद के  वर्षों में कुछ लोगों के लिए यह  daily का  व्यवसाय बन गया है । 

लोग एक दूसरे की देखा देखी शेयर बाजार में आते हैं परंतु ऐसा नहीं है । यहां पर विश्लेषण करके आना अति आवश्यक है।  इसमें प्रवेश करने से पूर्व कुछ ज्ञान अवश्य ले लीजिए।  शेयर बाजार की तकनीकी बारीकियां सीखिए ।   इसकी शब्दावली को पूरी तरह  जानिए।  



यह बात हकीकत है कि शेयर बाजार में कोई भी एक्सपोर्ट या विशेषज्ञ नहीं है, चाहे वह 20 से 25 वर्षों से अधिक यहां कार्य कर रहा हो।  शायद इसी वजह से इसे सेंसेक्स अथवा सेंसिटिव इंडेक्स कहा जाता है क्यूंकि यह बाजार के मूड के आलावा काफी सारे फैक्टर्स पर कार्य करता है।   


 आजकल मल्टीबैगर स्टॉक्स  ने आम आदमी को शेयर मार्केट की ओर अग्रसर होने पर मजबूर कर दिया है।  यह मल्टीबैगर स्टॉक्स वह स्टॉक्स होते हैं जो शेयर मार्केट में बहुत ही कम दामों में मिलते हैं और उनका रेट अचानक ही बढ़ जाता है लेकिन इसके पीछे एक गणित कार्य करता है । 


शेयर बाजार में 2 तरीके की लॉबी काम करती हैं।  एक वह होते हैं जो   तेजड़िये कहे जाते है और  दूसरे वह होते हैं जो  मंदड़िये  कहे जाते है। 

 तेजड़िये शेयर मार्केट में  शेयर के रेट  को ऊपर उठाने वाले लोग होते हैं इससे उन्हें फायदा होता है।  मंदड़िये  लोग मार्केट में शेयर के भाव को कम करते हैं इससे इन्हें कम करने में ही फायदा होता है।  


अब जानते हैं  शेयर का क्या अर्थ होता है ? शेयर  का अर्थ होता है हिस्सेदारी।  यह एक अंग्रेजी का शब्द है।  मान लीजिए कोई कंपनी में एक लाख के शेयर जारी हुए हैं कोई व्यक्ति जितने शेयर उस कंपनी में खरीदता  है  उसे उसकी उतनी हिस्सेदारी उस कंपनी में  मानी जाती है ,मान लीजिए किसी व्यक्ति ने 10000 शेयर खरीदे है  तो वह उस कंपनी में 10% का हिस्सेदार माना जाता है । 


स्टॉक्स-   स्टॉक उस कंपनी में उस व्यक्ति की हिस्सेदारी को दिखाता है व्यक्ति उस हिस्सेदारी को जब चाहे किसी अन्य को बेच सकता है और किसी अन्य से वह शेयर खरीद सकता है बशर्ते कि उसका शेयर मार्केट के अनुसार रजिस्टर्ड डिमैट अकाउंट हो।  


भारत के सबसे बड़े दो  स्टॉक एक्सचेंज को बीएसई और एनएसई कहा जाता है।  बीएससी का अर्थ है  बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज और एनएससी का अर्थ है नेशनल स्टॉक एक्सचेंज।  बीएससी और   एनएससी में कंपनी के शेयर लिस्टेड किए जाते हैं, जो कंपनी की लाभदायकता के अनुसार शेयर का मूल्य दर्शाते है।   यह पूरा शेयर बाजार सेबी द्वारा नियंत्रित होता है।   सेबी अर्थात भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड  या सिक्योरिटीज एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया।  


सेबी की अनुमति के बिना कोई भी कंपनी अपना आईपीओ अर्थात इनिशियल पब्लिक आफरिंग जारी नहीं कर सकती।  कोई भी कंपनी स्टॉक मार्केट में सूचीबद्ध होने के लिए स्टॉक एक्सचेंज में  निश्चित सौदा करती है जिसके अनुसार उस कंपनी का समय समय पर अपनी गतिविधियों की जानकारी बाजार को देना जरूरी होता है।  इस जानकारी का प्रभाव निवेशकों पर पड़ता है ,जिससे निवेशक कंपनी का मूल्यांकन कर पाते हैं और इसी के आधार पर कंपनी के शेयर की मांग घटती या  बढ़ती है और शेयर की कीमत ऊपर नीचे होती है।  अगर कोई कंपनी सेबी के  नियमों का पालन नहीं करती तो  सेबी उसे एक्सचेंज से हटाने का अधिकार रखती है । 


आइए जानते हैं शेयर के प्रकार  - सामान्य शेर  कॉमन शेयर्स वे होते हैं  जिनकी संख्या सबसे अधिक है।   बोनस शेयर या लाभांश शेयर कंपनी देती है जो कि उसके मौजूदा लाभांश का एक अंश होता है।  


आइए जानते हैं ।  stock कैसे खरीदें ?  यह आप पर निर्भर करता है कि आप खुद स्टॉक्स खरीदना चाहते हैं या किसी  ब्रोकर की मदद से ?  ब्रोकर आपका उचित प्रकार से मार्गदर्शन करके उसके बदले कोई निश्चित फीस लेता है या आपके धन का  प्रतिशत वह लेता है । 


किसी वस्तु या सेवा को कुछ समय के बाद लाभ ना  पाने की अपेक्षा से जब आप खरीदते हैं तो वह ट्रेडिंग कहलाता है यह शेयर बाजार का सबसे प्रचलित शब्द है, सरल शब्दों में लाभ कमाने के उद्देश्य से स्टॉक को खरीदना या बेचना ट्रेडिंग कहलाता है।  


 शेयर खरीदना तब चाहिए जब उसका दाम कम हो और होल्ड करके उसे रखो फिर तब बेचो जब उसका दाम अधिकतम ऊंचाई पर आ जाएं परंतु शेयर मार्केट में इतनी अनिश्चितता बनी रहती है कि मार्केट कब घटेगा या बढ़ेगा या कोई विशेषज्ञ भी नहीं कह पाता ।  


आइए जानते हैं ट्रेडिंग के प्रकार - 


इंट्राडे - 

1 दिन के लिए किया जाने वाला बाय/सेल का प्रकार है


स्विंग ट्रेडिंग - 

इसमें  शेयर खरीदने के बाद कुछ हफ्ते दिन नया महीने के बाद लाभ मिलने पर बेचा जाता है


तीसरा प्रकार है - 

स्कल्पिंग वास्तविक समय के तकनीकी विश्लेषण के आधार पर व्यापार करने की एक विधि है। फोरेक्स ट्रेडिंग में स्कल्पिंग का मतलब है आमतौर पर बड़ी संख्या में ट्रेडों को रखना, ताकी प्रत्येक ट्रेड से छोटा मुनाफा कमाया जा सके। कई घंटों, दिनों या हफ्तों के लिए एक स्थिति रखने के बजाय, स्कैल्पिंग का मुख्य लक्ष्य कुछ ही मिनटों में कुछ पिप्स प्राप्त करना है। 


कंपनी के बारे में पूरी और सही जानकारी हो तो स्टॉक मार्केट में मुनाफा कमाया जा सकता है



आइए अब जानते हैं खाता कैसे खोलें ? 


खाता खोलने के लिए आपको केवाईसी करवाना होगा और demat एवं ट्रेडिंग अकाउंट खोलना होगा । 

डिमैट अकाउंट में  आपके शेर डिजिटल फॉर्म में सुरक्षित रखे जाते हैं और ट्रेडिंग अकाउंट में आप धनराशि जमा रखते हैं जिससे आप ट्रेड कर सकते हैं या शेयर को खरीद व   बेच  सकते हैं।  इस कार्य में मदद के लिए कुछ ब्रोकेरिंग फर्म्स है जो आपने कुछ  प्रतिशत मुनाफा लेकर आपको ट्रेडिंग में मदद करती है -  इनमे प्रमुख है -  groww  , Zerodha , Upstox  आदि।   


फिर मार्केट के विशेषज्ञ कैंडल चार्ट को देखकर अर्थात मोमबत्ती चार्ट को देखकर शेयर मार्केट के बारे में बताते हैं कि कौन से समय शेर खरीदना और बेचना उचित है कैंडल चार्ट में लाल और हरी  दो प्रकार के कलर वाली मोमबत्तियां होती है जो मार्केट के अप्प ट्रेंड या डाउनट्रेंड को दर्शाती है ।  




शेयर बाजार में दो महत्वपूर्ण कारक कार्य करते हैं  - डर और लालच


share  का दाम बढ़ने पर लालच आप पर हावी होता है और share  का दाम घटने पर   डर आप पर हावी होता है और इसी का फायदा किसी ना किसी निवेशक को हो रहा होता है।  अगर आप शेयर बाजार में सफल होना चाहते हैं तो आपका धन है इसीलिए निर्णय भी आपको ही लेना होगा कि आपको मार्केट में कब आना है और मार्केट को कब छोड़ना है   कब शेयर को खरीदना है और कब शेयर को बेचना है ।  


क्या आप अमीर बनना चाहते हैं ?

 क्या आप अमीर बनना चाहते हैं ? 




क्या आप अमीर बनना चाहते हैं ?  तो जान लीजिए कि 95% अमीर लोग पैसों के बारे में अलग तरीके से कैसे सोचते हैं ।  


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अमीर व्यक्ति रिस्क लेते हैं।  

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 आप हर बार सफल ही हो यह जरूरी नहीं ।  आपको भावनात्मक रूप से अमीरों की तरह मजबूत बनना ही होगा।  


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90% वही लोग आगे बढ़ते हैं।  

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यदि वे असफल रहते हैं, तो बार-बार पर प्रयत्न  तब तक  करते हैं जब तक कि सफलता ना मिले और यदि उन्हें लगता है कि यह रास्ता ठीक नहीं है तो वे रास्ता बदलने को भी तैयार रहते हैं।  

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उन्हें हारने या  असफल होने का भय नहीं होता।  

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 वे हमेशा सीखते हैं।  


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85% अमीर लोग स्वयं के विकास पर पैसा खर्च करते हैं।  


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अमीर किस जगह पर पैसा लगाते हैं ?  जहां धन की बढ़ोतरी होती रहे।  

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वे  बचत से ज्यादा इन्वेस्टमेंट INVESTMENT करने में यकीन रखते हैं।  

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आश्चर्यजनक रूप से यह बात सत्य है कि वह(99%अमीर) धन से अधिक समय को महत्व देते हैं, 

क्योंकि धन तो कमाया जा सकता है 
परंतु 
समय नहीं।  


Saturday, July 22, 2023

अमीर क्यों बनना चाहिए ?

 



अमीर क्यों बनना चाहिए ?







इन्फ्लेशन या मुद्रास्फीति रोकड़ अर्थात कैश को खा जाती है।  आपकी इनकम 6% यदि बढ़ती है तो इन्फ्लेशन 10% के आसपास बढ़ जाती है।  आइए इस मुद्रास्फीति को समझते हैं यदि एक व्यक्ति 1980 में किसी वस्तु को ₹1000 में खरीद सकता था, तो अब वही वस्तु 2023 में ₹10000 से भी अधिक में खरीद पाएगा।  सोना जो एक बहुमूल्य धातु है 1980 में 10 ग्राम  ₹1330 का था 2022 में वह 10 ग्राम ₹50205 का हो गया।  इस प्रकार हम मुद्रास्फीति को समझ सकते हैं इसका सामान्य अर्थ यह हुआ कि यह बचत जो है वह व्यर्थ धन हो जाता है।   निवेश ही सब कुछ है धन तभी अच्छा है जब अन्य कागज की तरह न रखकर उसका उपयोग किया जाए।   बैंक में रखा हुआ बचत खातेमें रखा हुआ  धन  आपको अमीर नहीं बनाता क्योंकि बैंक आपको केवल 4% तक इंटरेस्ट देता है इस प्रकार आप के धन को डबल होने में लगभग 500 वर्ष का समय चाहिए । अगर आपका धन बढ़ नहीं रहा तो आप जल्दी ही दिवालिया हो जाएंगे।  धन राजा नहीं है परंतु बहता हुआ धन राजा है।   


'Flowing Cash is Money'  धन बढ़ाने के लिए स्वयं में ,व्यापार में, रियल एस्टेट में निवेश कीजिए और पैसिव इनकम के सोर्स बनाइए ।  क्या आप धनवान बनना चाहते हैं ? क्या धनवान बनने का रास्ता बचत को मानते हैं  ? तो आप गलत है।   इसके लिए आपको यह लेख पढ़ना अति आवश्यक है क्योंकि बचत से आप कभी भी अमीर नहीं बन सकते, आप केवल निवेश से ही अमीर बन सकते हैं ।  आपके आसपास के वातावरण का असर आप पर अवश्य होता है।  अगर आप के सलाहकार स्वयं धन के प्रबंधन को नहीं जानते और अभी आपको सलाह दे रहे हैं कि अमीर कैसे बने ?  तो आप कभी भी अमीर नहीं बन सकते ।  धनवान बनने के लिए आपको धन कमाने के रास्ते ढूंढने होंगे ।  इसके लिए आपको इंटरनेट का उपयोग करना सीखना होगा।  डिजिटल वस्तुएं बेचना सीखना होगा।   आपको अपनी कौशल अर्थात स्किल को बढ़ाना होगा ।   गणित के अनुसार गणना करनी होगी, एक योजना बनानी होगी और फिर आगे बढ़ना होगा ।  


पैसे पेड़ पर नहीं उगते। परंतु ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जो यह कह सके कि मैं खुश हूं क्योंकि मैं अमीर नहीं हूं ।  हर कोई धन चाहता है केवल प्यार नहीं।  सच तो यह है कि धन सब कुछ नहीं तो धन के बिना भी कुछ नहीं।   बचपन से आपको यह गलत सिखाया गया है कि धन के पीछे मत भागो।  जबकि आपको यह जानना जरूरी है यदि आप अधिक  धन कमाते हैं तो आप अधिक लोगों की मदद भी कर सकते हैं।  आप अरबपति बनते हैं तो आपके साथ जुड़े लोग भी करोड़पति   लखपति तो बन ही जाते हैं  । आप लोगों की मदद करना, दान देना, जैसे भले कार्य तभी कर पाते हैं जब आपके पास पर्याप्त मात्रा से अधिक धन हो।  


चंद सवालों के जवाब देने के कार्यक्रम से या लॉटरी का टिकट खरीदने से धनी बननेवाले लोग बहुत जल्दी ही गरीब भी बन जाते हैं क्योंकि उनकी मानसिकता गरीबों वाली ही रहती है।  अमीर बनना एक गणित है, एक तरीका है, यह कोई भी शॉर्टकट नहीं है । लोग इसलिए अमीर नहीं बन पाते क्योंकि वह सम्भावनाओ पर विचार ही नहीं करते । जो अमीर बनने के लिए जरूरी है आपके पास अमीर बनने का एक ब्लूप्रिंट या रूपरेखा होनी चाहिए।   कुछ लोग धन कमाना जानते हैं,  कुछ लोग धन को जोड़ना जानते हैं और बहुत कम लोग धन को बढ़ाना जानते हैं।   टीवी, स्कूल ,कॉलेज, ऑनलाइन सभी जगह हास्यास्पद वित्तीय सलाह दी जा रही है।  एक कथन बरसों से कहा गया है -उधार बीमारी है -कभी मत लो ,परंतु सच तो यह है कि उधार भी दो प्रकार का होता है -अच्छा उधार और बुरा उधार।  अमीर व्यक्ति दूसरों के धन पर, बैंक से धन लेकर, आईपीओ से धन लेकर, बिजनेस करते हैं यह सब अच्छे उधार के प्रकार ही तो है।  धन बनाने में, कमाने में बिजनेस करने में स्पष्टता चाहिए, तभी आप प्रगति कर सकते हैं अन्यथा नहीं।  धन का यह गोल्डन नियम है आपको समाज की एक बंधी हुई मानसिकता से बाहर आकर कार्य करना होगा, सोचना होगा ,समाज की  मानसिकता कहती है कि अच्छे से पढ़ाई करो -अच्छी नौकरी करो -अच्छा घर खरीदो, शादी करो, बच्चे पैदा करो, बुढ़ापे के लिए धन की बचत करो और ईश्वर का धन्यवाद करो यह चक्र समाज में वर्षों से चलता रहता है कोई भी यह नहीं कहता कि आप को शिक्षित होकर एक एंटरप्रेन्योर बनना है और बिजनेस करके कई लोगों को नौकरी देनी है।